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अपनी बेकसी पर आंसू बहा रही प्रेमचंद की ईदगाह

जिम्मेदारों को इसके रख रखाव में कोई दिलचस्पी नही

मनव्वर रिज़वी

गोरखपुर। दीवारों में साफ नजर आती दरारें उजड़े प्लास्टर और जर्जर पुराना गेट। यह किसी हॉरर फिल्म का सेट नहीं बल्कि गोरखपुर की ईदगाह है । यह वही ईदगाह है जिसके बारे में कहा जाता है कि मुंशी प्रेमचंद्र ने ईद के दिन इसी ईदगाह के पास लगने वाले मेले को देख कर अपनी अमर कहानी ईदगाह लिखी थी।
आपको बता दें कि गोरखपुर शहर की पहचान बन चुके मुबारक खां शहीद बाबा का आस्ताना इस ईदगाह से बिल्कुल सटे स्थित है । शाम के समय रोशनी में नहाई इस दरगाह को देखकर जहां सुख और शांति की अनुभूति होती है वही इसके दक्षिण में स्थित वीरान उजड़ी ईदगाह को देखकर एक अजीब सा एहसास दरगाह पर आने वालों और यहां से गुजरने वालों को होता है।
इस ईदगाह के बारे में जानकारी करने पर पता चला कि इसका रखरखाव अंजुमन इस्लामिया के जेरे निगरानी में है। अंजुमन इस्लामिया खूनीपुर जाने वाली रोड पर स्थित है जो कभी दीनी और अदबी दानिशवरों का मरकज हुआ करती थी, लेकिन बदलते वक़्त के साथ इसका निज़ाम ऐसे लोगों के हाथ में आ गया जिन्होंने इससे एक दुधारू गाय की तरह सिर्फ मुनाफा हासिल किया और देखते ही देखते अंजुमन मुनाफाखोरों और चापलूसों का मरकज़ बन गई। मैनेजमेंट के बर्ताव से यहां के दानिशवरों और दीनदारों को जाने के लिए मजबूर होना पड़ गया। कुछ एक बचे भी तो हालात का शिकार होकर यहीं रह गए।
अंजुमन इस्लामिया की स्थित आज ऐसी है कि मैनेजमेंट ने इसके दरवाज़े का भी सौदा कर दिया है और छोटी दुकानों के एवज में गरीब व बेरोज़गार मुस्लिम नौजवानों से मुँह मांगी रकम मांगी जा रही है। वर्तमान समय में ईदगाह की देखरेख कर रही अंजुमन इस्लामिया की कमेटी के पास तमाम दुकाने व कई मकान हैं जिनसे सालाना लाखों की कमाई होती है लेकिन उस आमदनी को कहाँ खर्च किया जा रहा कोई नही जानता। आज भले ही अंजुमन इस्लामिया और ईदगाह की बाहरी दीवारों पर रंग रोगन करा दिया गया है लेकिन यह दोनों अब बिल्कुल खोखले हो चुके हैं। आपको यह भी बता दें कि ईदगाह के रखवालों के जिम्में अंजुमन इस्लामिया के अलावा एम0एस0आई0 इंटर कालेज का भी मैनेजमेंट है ।

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