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आस्था और विश्वास का प्रतीक अक्षतानाथ मंदिर


रिपोर्ट : एन. अंसारी

कौड़ीराम गोरखपुर । मनौती पूर्ण होने पर लोग केवल जल चढ़ाने की परम्परा वाले मजुरी गांव मे स्थित अक्षतानाथ शिव मंदिर स्वयं भू लिंग है जिसकी स्थापना कलच्यूरियो के वंशजो द्वारा कराया गया है। मंदिर के बगल मे 85 एकड़ बे चीरागी गांव कठदेउर पुरातात्विक विभाग का उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। विभाग द्वारा यदि उत्खनन कराया कराया जाए तो प्राचीन काल की दुर्लभ वस्तुओ के अवशेष मिल सकते है। गगहा थाने के अन्तिम सीमा पर बसा मजुरी गांव उज्जैनी ठाकुरों का गांव है। जिसके इसान कोण उत्तर पूर्व के कोने पर विशाल शिव मंदिर स्थापित है। उज्जैन ठाकुरों के कुल देवता महादेव है। इसी आधार पर मंदिर की स्थापना की गई है। बताया जाता है कि 13 वी सदी में गढ़वालो ने कलचूरियों को पदच्युत कर अपना शासन बनाया था। कल्चुरियों के मूल उपासक भगवान शिव है। इस मंदिर की स्थापना इन्ही के द्वारा होना बताया जाता है। इस आशय का लिखित प्रमाण इंडियन एंटी क्योटो मे कहला और सहगौरा के तामपत्र पर वर्णित है ।यहां पर मान्यता है कि काल सर्प योग से ग्रसित कोई भी व्यक्ति यदि नासिक के त्रयंबकम मंदिर नहीं जा पाता है तो वह मजुरी गांव के अक्षतानाथ मंदिर मे ही पूजा करके काल सर्प योग से छुटकारा पा सकता है। इसके अलावा और तमाम महात्म्य के बारे मे मंदिर प्रसिद्व है। मंदिर के बारे में यह खास तौर से प्रसिद्व है कि मनौती पूरा होने पर भगवान भगवान शिव को मात्र एक घड़ा जल ही चढ़ाया जाता है। वह उसी से प्रसन्न रहते है वैसे मलमास शिवरात्रि और नवरात्र मे मंदिर के पुजारी व गांव के प्रधान ब्रम्हानंद यादव की तरफ से बिशेष व्यवस्था रहती है।

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