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इमामबाड़ा स्टेट में शिक्षा के नाम पर करोड़ों की लूट

मुस्लिम शिक्षा के नाम पर यहां स्थापित एक संस्थान में शिक्षा के व्यवसायिकरण के बाद नर्सरी में एडमिशन मंहगा और एक आम मुसलमान की पहुंच से हुआ दूर

मनव्वर रिज़वी

गोरखपुर। इमामबाड़ा स्टेट वक्फ़ नम्बर 67 में लूट का आरोप और उसकी पड़ताल में एक दूसरी तस्वीर व एक और अलग हक़ीक़त तब सामने आई जब हमने उन पन्नों को पलटा जो इतिहास को अपने अंदर समेटे हैं।
यह बात कहना उचित होगा कि तमाम घोटालों के बावजूद शिक्षा को लेकर इमामबाड़ा स्टेट की नीति हमेशा उदार बनी रही जिसका फायदा उन लोगों ने उठाया जिनका इमामबाड़ा स्टेट से कोई सीधा सम्बन्ध नही था। इसकी एक बानगी शहर के बीचों बीच स्थित एक इंटर कालेज और फिर उसी कैम्पस में लगभग तीन दशक पूर्व में बना डिग्री कालेज है जो शिक्षा देने के लिए बनाया तो गया लेकिन इसने पिछले 30-35 सालों के बीच कुछ खास व्यक्तियों को रोड़पति से करोड़पति बना दिया और आज भी यह संस्थान उन व्यक्तियों की निजी जागीर बना हुआ है।
गरीब मुसलमानों के बच्चों की तालीम के नाम पर शुरू किये गये इस कॉलेज में शिक्षा के व्यवसायिकरण के बाद यहां स्थापित एक अन्य संस्था में नर्सरी एडमिशन मंहगा और एक आम मुसलमान की पहुंच से दूर हो गया है ।
इमामबाड़ा स्टेट के तत्कालीन मुतवल्ली जव्वाद अली शाह से 4 मई 1938 को दो सौ ग्यारह रुपया चार आना वार्षिक की दर पर लीज़ पर लिए गए इस परिसर को कैसे एक दूसरी संस्था को रजिस्ट्री कर दिया गया इसकी दास्तान हम अगले भाग में बताएंगे।
आज भले ही इमामबाड़ा स्टेट को उसकी अपनी इस संपत्ति से एक कौड़ी न मिल रही हो लेकिन वक्फ़ अलल खैर यानी मुसलमानों की भलाई के लिए स्थापित इस स्कूल – कालेज और इसके बाहरी परिसर में बनी सैकड़ों व्यवसायिक सम्पत्तियों से होने वाली आमदनी ने इन सफेदपोशों के क़द को इतना ऊंचा कर दिया है कि कही न कहीं इनके सामने इमामबाड़ा स्टेट के सज्जादानशीन अदनान फर्रुख अली शाह का व्यक्तित्व भी छोटा लगने लगा है।
बहरहाल इमामबाड़ा वक्फ़ नम्बर 67 की सम्पत्तियों में 1900 करोड़ के घोटाले की चल रही जांच के दौरान सफेदपोशों द्वारा की गई इस लूट को देखकर एक लाइन याद आ जाती है कि “हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था…..”।

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